दतिया के चुनाव परिणाम पहले से ही तय थे, हालांकि अब आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल निकला है। कांग्रेस अध्यक्ष पटवारी को खुश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वहां पहले भी कांग्रेस जीती थी। अप्रत्याशित यह है कि पुनः जीत गई। आम तौर से देखा जाता है कि उपचुनावों में ज्यादातर सत्ता पक्ष का प्रत्याशी ही जीतता है, क्योंकि विपक्षी को जिताने का फायदा भी क्या है? वह न तो विकास कार्य करवा पाएगा, न ज्यादा चिल्ला पाएगा।
वर्तमान भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के पास पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा के खिलाफ भीतरघात के सबूत हैं, लेकिन वे उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे, क्योंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की खाली सीट पर जनस्वराज पार्टी के प्रत्याशी प्रशांत किशोर जीत गए हैं।
आखिर किस-किस पर कार्रवाई होगी? मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जो पराजय के बारे में बयान दिया है उसमें उन्होंने कहा है कि हमारे वोट बढ़े हैं, हार गए तो क्या हुआ। उन्हें इस बात की खुशी है कि नरोत्तम जैसे प्रतिद्वंद्वी से उनका पीछा छूट गया है। सवाल यह भी है कि भाजपा यदि नरोत्तम मिश्रा को टिकट देती तो क्या वे जीत जाते, निश्चित रूप से जीत जाते। क्योंकि पिछले चुनाव में वे गफलत के कारण हार गए थे, इस बार नहीं हारते।
जो भी हो, लेकिन वर्तमान परिणामों में कांग्रेस की कोई उपलब्धि नहीं रही है। भाजपा की आपसी फूट का लाभ उसे मिला है। चुनाव में धन बल, जन बल झोंकने वालों को विचार करना चाहिए कि यदि इसी प्रकार के परिणाम आते हैं तो चुनाव सुधार के अंतर्गत उपचुनाव की प्रथा बंद करना चाहिए। इनमें समय एवं धन की बर्बादी होती है। राजनीतिक दल जो आपसी सिर फुटव्वल करते हैं उससे कहीं न कहीं मतदाता नाराज भी रहते हैं, जिसके फलस्वरूप चौंकाने वाले परिणाम आते हैं।
दीपक शर्मा
दैनिक चेतन्यलोक